हर साल सावन के महीने में शिवभक्ति का जनसैलाब सड़कों पर उमड़ता है। भगवा कपड़ों में लिपटे कांवरिए कंधे पर कांवर रखकर गंगा जल लाते हैं और भोलेनाथ को अर्पित करते हैं। इस यात्रा को आस्था का प्रतीक माना जाता रहा है। लेकिन बीते कुछ सालों से इस आस्था की तस्वीरें सवालों के घेरे में हैं।
बस्ती के कांवर ग्रुप का वीडियो वायरल, अनुराधा पौडवाल भी भड़कीं

हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ है, जिसमें उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले का एक कांवर ग्रुप अयोध्या से जल लेकर लौट रहा था। इस दौरान उनके ट्रैक्टर पर अश्लील डांस होता देखा गया। ट्रैक्टर पर डांसर्स ठुमके लगाती नजर आईं और कांवरिए उनके साथ गानों पर झूमते दिखाई दिए।
यह वीडियो इतना वायरल हुआ कि मशहूर भजन गायिका अनुराधा पौडवाल तक भी पहुंच गया। उन्होंने इस पर नाराजगी जताते हुए वीडियो पर कमेंट कर लिखा —
‘ये नॉनसेंस बंद करो प्लीज।’
सड़कों पर हंगामा, तोड़फोड़ और छेड़छाड़ की घटनाएं भी

यह मामला अकेला नहीं है। कई जगहों से खबरें आ रही हैं कि कांवर यात्रा के नाम पर युवा सड़कों पर हुड़दंग करते दिख रहे हैं। कहीं राहगीरों के साथ मारपीट की घटनाएं सामने आ रही हैं तो कहीं दुकानों में तोड़फोड़। कई इलाकों में महिलाओं के साथ छेड़छाड़ की भी रिपोर्ट्स आई हैं। सोशल मीडिया पर कई ऐसे वीडियो वायरल हैं, जिनमें कांवरिए ट्रैफिक जाम कर डीजे पर नाचते, शराब पीते और राहगीरों से झगड़ते नजर आ रहे हैं।
सवाल : क्या ये आस्था है या आस्था के नाम पर तमाशा?

आस्था का मतलब अनुशासन और भक्ति होता है। कांवर यात्रा की शुरुआत ईश्वर की पूजा और साधना के उद्देश्य से होती है, न कि डीजे पार्टी, अश्लीलता और सड़कों पर अराजकता फैलाने के लिए। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ये नये दौर की कांवर यात्रा असली आस्था दिखा रही है या फिर आस्था के नाम पर तमाशा बनती जा रही है? भक्ति मार्ग पर चलने का मतलब क्या यही है कि महिलाएं ट्रैक्टर पर डांस करें और कांवरिए नशे में झूमें? क्या भोलेनाथ की भक्ति इस तरह के कृत्यों से खुश होती होगी? या फिर कुछ लोगों की हरकतों की वजह से हजारों-लाखों सच्चे भक्त बदनाम हो रहे हैं?
क्या कहते हैं आम लोग?
कुछ लोगों का कहना है कि ये सब ‘आस्था’ का हिस्सा नहीं है, बल्कि आधुनिकता और सोशल मीडिया दिखावे की वजह से कांवर यात्रा का स्वरूप बिगड़ गया है। वहीं, कुछ लोग इसे आज के युवाओं की भक्ति का नया तरीका मानते हैं।
Aanchal Choudhary ( Swaraj Express )
कांवड़ यात्रा भगवान शिव की भक्ति और समर्पण की पवित्र परंपरा है। जिसका मूल उद्देश्य श्रद्धा, अनुशासन और सेवा है। सच्चे कांवड़िए बिना चप्पल के, पूरे मन से यह यात्रा करते हैं, जिसका गहरा धार्मिक और सामाजिक महत्व है।
लेकिन अब कुछ स्थानों पर आस्था की इस यात्रा का स्वरूप बदलता नजर आ रहा है। कई ऐसे वीडियो वायरल हो रहे हैं जिनमें ट्रैक्टर पर अश्लील डांस, शराब पार्टी, सड़कों पर मारपीट और अराजकता दिख रही है। जो कि कांवड़ यात्रा की मूल भावना और धार्मिक मर्यादा के खिलाफ हैं। कांवड़ यात्रा के नाम पर ऐसे कृत्य समाज में चिंता का विषय है। ऐसे व्यवहार को ‘भक्ति’ नहीं बल्कि आस्था के नाम पर तमाशा कहा जाता है।
सच्ची श्रद्धा वही है जो मर्यादा, अनुशासन और भक्ति के साथ हो। कांवड़ यात्रा के नाम पर अश्लील प्रदर्शन, शराब पार्टी, सड़कों पर हंगामा—ये सब आस्था नहीं, बल्कि उसकी आड़ में अराजकता है। जो कि निंदनीय है और इसे पूरी तरह रोकना चाहिए।
Adarsh Pandey ( Media Student )
मेरी राय साफ़ है:
कांवड़ यात्रा आस्था है, लेकिन जो कुछ लोग कर रहे हैं, वो तमाशा है – और वो भी ऐसा तमाशा जो न समाज के लिए ठीक है, न धर्म के लिए।
अब फैसला आपके और हमारे जैसे लोगों को करना है ..
क्या हम ऐसे ‘भक्तों’ के तमाशे पर चुप रहेंगे,
या अपने धर्म की गरिमा को बचाने के लिए आवाज़ उठाएंगे?
भक्ति में भाव चाहिए, न कि भांग।
आस्था को शर्मिंदा करने वाले कांवरिए कौन?

सवाल बड़ा है — आखिर वे लोग कौन हैं जो आस्था को अश्लीलता में बदल रहे हैं? और क्या प्रशासन इन्हें रोकने के लिए कोई ठोस कदम उठाएगा?
भक्ति और भक्ति के नाम पर हो रहे हंगामे के बीच रेखा खींचने का समय आ गया है। अन्यथा आने वाली पीढ़ियां शायद कांवर यात्रा को आस्था का नहीं, अश्लीलता और हुड़दंग का त्योहार मानने लगेंगी।
‘Teekhi Varta’ आपसे पूछता है — क्या ये आस्था है या आस्था का मजाक?
अपनी राय जरूर दें।
Story covered by Ayush Singh

