हाल ही में महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में भाषा को लेकर एक बार फिर विवाद ने तूल पकड़ लिया है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो और विभिन्न संस्थानों में सामने आ रही घटनाएं इस बात की ओर इशारा कर रही हैं कि देश में भाषायी विविधता अब कभी-कभी टकराव का कारण बनती जा रही है।
क्या भाषा विवाद की जड़ें गहरी होती जा रही हैं?
महाराष्ट्र के पुणे और ठाणे जैसे शहरों में कुछ घटनाएं सामने आई हैं जिनमें हिंदी बोलने वाले लोगों से जबरन मराठी बोलने की मांग की गई, और ऐसा न करने पर उनके साथ दुर्व्यवहार भी हुआ। MNC ऑफिसों से लेकर कॉलेज परिसरों तक, यह विषय अब एक सामाजिक तनाव का रूप ले रहा है।
यह पहली बार नहीं है जब ऐसा हुआ हो। महाराष्ट्र में समय-समय पर हिंदी बनाम मराठी का मुद्दा उठता रहा है। हिंदी फिल्मों में मराठी कलाकारों की संख्या कम होने की शिकायत, या फिर हिंदी बोलने वालों को स्थानीय मानने से इनकार—ये सभी घटनाएं एक गहरे असंतुलन की ओर इशारा करती हैं।
संविधान क्या कहता है?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 हर नागरिक को भाषा, वाणी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। यानी भारत में कोई भी नागरिक किसी भी भाषा में बात करने के लिए स्वतंत्र है। ऐसे में भाषा को लेकर किसी प्रकार का ज़ोर-ज़बरदस्ती करना संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है।
हिंदी बनाम मराठी – असल मुद्दा क्या है?
महाराष्ट्र की भूमि मराठी संस्कृति और भाषा का गढ़ मानी जाती है, लेकिन साथ ही यह मुंबई जैसे महानगर की वजह से हिंदी भाषियों का प्रमुख केंद्र भी बन गई है। यहाँ बड़ी संख्या में उत्तर भारतीय रहते हैं, जो अपने साथ हिंदी भाषा और संस्कृति भी लाते हैं। यही मिश्रण कभी-कभी टकराव की स्थिति पैदा करता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिर्फ भाषा का नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान और क्षेत्रीय अस्मिता का संघर्ष बन चुका है।
शिक्षा संस्थानों में भी असर
IITs और NITs जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में भी हिंदी और क्षेत्रीय भाषा बोलने वाले छात्रों के बीच संवादहीनता और भेदभाव की खबरें समय-समय पर आती रही हैं। इससे स्पष्ट है कि यह विवाद अब केवल राज्य स्तर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी चुनौती बन रहा है।
आपकी आवाज —
Aanchal Choudhary ( Swaraj Express )
भारत में भाषा अब केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि अस्मिता और पहचान का मुद्दा बन चुकी है। महाराष्ट्र में हिंदी भाषियों पर मराठी बोलने का दबाव और तमिलनाडु में हिंदी-विरोध की घटनाएं इसी दिशा में इशारा करती हैं। हाल ही में महाराष्ट्र सरकार को स्कूलों में हिंदी अनिवार्य करने का फैसला विरोध के चलते वापस लेना पड़ा। मुंबई की लोकल ट्रेन से लेकर दफ्तरों तक, भाषा टकराव का कारण बन रही है। दक्षिण भारत में हिंदी के विरोध को स्थानीय अस्मिता से जोड़कर देखा जाता है। यह भाषाई संघर्ष समाज को बांट रहा है। संविधान हर नागरिक को अपनी मातृभाषा में बोलने का अधिकार देता है—चाहे वह हिंदी हो या मराठी। जब तक भाषा स्वाभाविक ढंग से बोली जाए, विविधता हमारी ताकत बनी रहती है। इसलिए ज़रूरत है कि भाषा के जरिए संवाद और सम्मान को बढ़ावा दिया जाए, न कि दूरी और विवाद को।
क्या इसका कोई समाधान है?
फिलहाल, सभी पक्षों और प्रशासन से शांति बनाए रखने की अपील की जा रही है। लेकिन बार-बार उठते इस विवाद से यह प्रश्न जन्म लेता है — क्या अब भारत को एक स्पष्ट, संतुलित और सहिष्णु भाषा नीति की ज़रूरत है, जो न केवल संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करे, बल्कि सामाजिक सौहार्द को भी बढ़ावा दे?
Story covered by Tanushree Gupta

