क्या होगा जब आप ये खबर पढ़ेंगे की वो लड़का जो पत्रकारिता की आवाज़ बनने वाला था, वो आवाज़ अब शांत हो गई। उसके घरवालों पर कभी न खुलने वाली चुप्पी क्या असर डालेगा , ये हम और आप सोच भी नहीं सकते। ऐसे ही मैं भी घर से 1000 किलोमीटर दूर, भोपाल के पत्रकारिता विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा हूँ। और इन्हीं दिनों जब बिहार विधानसभा चुनाव में जब फील्ड पर हाथों में माइक लेकर उतरता हूँ, तो अनगिनत चुनौतियाँ सामने आती हैं। एकाध बार धमकियाँ भी आईं कि “साथ रहकर काम करो… विरोध मत करो।” कभी-कभी मन में यही सवाल उठता है .. अगर किसी दिन ऐसे ही किसी क्राइम को एक्सपोज़ करते हुए, किसी गरीब की आवाज़ उठाते हुए, मेरी आवाज़ दबा दी गई… तो क्या लोग मेरी आवाज़ को सुन पाएँगे? महसूस कर पाएँगे? हम पत्रकारिता पैसों के लिए नहीं कर रहे हैं ना? पैसे कमाने के तरीके तमाम थे, लेकिन हमें तो उन आवाज़ों को उठाना था जो दबा दी गई थीं। लेकिन जब हमारी ही आवाज़ें दबने लगें या दबा दी जाएँ… तो मन में ऐसे अनगिनत सवाल आना स्वाभाविक है कि यदि पत्रकारिता करते-करते हम शहीद हो जाएँ, तो क्या हमारी उन आवाज़ों को कोई महसूस कर पाएगा? क्या कोई ये सुन पाएगा जो हम आख़िरी साँस लेते हुए कह रहे होंगे ? “माँ को समझा देना कि उसका बेटा उसके साथ है… उसकी लेखनी और रिपोर्ट हमेशा लोगों के बीच रहेगी… पापा को समझा देना कि उनका बेटा लोगों के हक़ के लिए लड़ते हुए मरा है… बहन को कहना कि अगली राखी पर मैं नहीं रहूँगा, तुम अपने भाई के माइक को राखी बाँध देना… भैया को समझा देना कि उसका छोटा भाई कभी हारा नहीं था, उसकी आख़िरी साँस में भी पत्रकारिता की लौ जल रही थी…” ये अनगिनत ख्याल क्या कोई महसूस कर पाएगा? लेकिन फिर दूसरा सवाल मन को खा जाता है — कि अगर लोग एक पल के लिए संवेदनाएँ दिखा भी दें, तो क्या याद रख पाएँगे? या भूल जाएँगे… उस युवा पत्रकार को, जिसने अपनी लेखनी से आग लगाई थी, जिसने वीडियो रिपोर्ट्स के ज़रिए सत्ता के भ्रष्टाचार को उजागर किया था? वो आवाज़ जो जनता की थी, जो सच्चाई की थी — वो आवाज़ अब शांत हो गई…l
By Ayush Singh
( लेखक एक स्वतंत्र पत्रकार एवं माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में मीडिया विद्यार्थी है l )