रेलवे यात्रियों को सस्ता और सुरक्षित सफर देने के दावे ज़मीन पर दम तोड़ते नजर आए। कुशीनगर एक्सप्रेस में Batangarh रिपोर्टर द्वारा की गई सीक्रेट वीडियो रिकॉर्डिंग ने ट्रेन के भीतर चल रही उस मनमानी को उजागर कर दिया, जिसे यात्री रोज़ झेलते हैं, लेकिन आवाज़ कम ही उठती है।
IRC के तय मेन्यू चार्ट को खुलेआम नकारते हुए ट्रेन में यात्रियों से पानी, चाय, केक और भोजन के नाम पर मनमाना पैसा वसूला जा रहा था। हैरानी की बात यह नहीं कि ओवरचार्जिंग हो रही थी, हैरानी यह है कि वेंडर्स इसे “मैनेजमेंट का आदेश” बताकर सही ठहराते कैमरे में कैद हुए।
14 रुपये की रेल नीर, 20 रुपये की ‘लोकल बोतल

IRCTC के अनुसार रेल नीर पानी की बोतल की कीमत 14 रुपये निर्धारित है, लेकिन रिपोर्टर की रिकॉर्डिंग में साफ दिखा कि यात्रियों को लोकल कंपनी की बोतल 20 रुपये में बेची जा रही थी।
जबकि पैंट्री में रेल नीर का स्टॉक मौजूद था, इसके बावजूद जानबूझकर लोकल बोतलों की सप्लाई की जा रही थी। सवाल यह है कि
👉 जब रेल नीर मौजूद थी, तो लोकल पानी क्यों?
👉 क्या कमीशन के लिए यात्रियों की सेहत से समझौता किया गया?
5 रुपये की चाय, 10 रुपये की वसूली
यहीं नहीं रुका मामला।
5 रुपये की स्टैंडर्ड चाय 10 रुपये में बेची जा रही थी। ऑन कैमरा वेंडर्स यह कहते सुने गए कि
“हम सब 10 रुपये में ही बेचते हैं, मैनेजर ने यही बोला है।”
सवाल उठता है कि अगर IRCTC का रेट चार्ट लागू नहीं है, तो फिर वह बनाया ही क्यों गया?
केक, थाली और बिल—तीनों में गड़बड़ी

ट्रेन में 38 रुपये MRP वाला केक 50 रुपये में बेचा गया।
80 रुपये की वेज थाली में 2–3 पराठे जोड़कर 130 रुपये वसूले गए।
जब यात्रियों ने बिल मांगा, तो एक ही जवाब मिला—camera
“बिलिंग मशीन खराब है।”
क्या यह संयोग है कि हर बार बिल मांगने पर मशीन खराब हो जाती है?
या फिर बिना बिल वसूली ही इस खेल की सबसे बड़ी ढाल है?
कैमरे से डर, सिस्टम से नहीं
जैसे ही रिपोर्टर ने कैमरे के साथ सवाल उठाए, वेंडर्स का रवैया बदला।
कुछ ने मजबूरी में पानी 15 रुपये में देना शुरू किया, लेकिन चाय 10 रुपये में ही बिकती रही।
यानी नियम नहीं बदले, सिर्फ कैमरे के सामने थोड़ी नरमी दिखाई गई।
बदतमीज़ी और मारपीट की आशंका

यात्रियों का कहना है कि जागरूकता की कमी का फायदा उठाकर यह मनमानी लंबे समय से चल रही है। कई बार सवाल करने पर वेंडर्स बदतमीज़ी पर उतर आते हैं, और हालात मारपीट तक पहुंचने की नौबत बन जाती है। मजबूर यात्री या तो ज्यादा पैसे देता है, या चुपचाप सह लेता है।
सवाल सिर्फ ओवरचार्जिंग का नहीं
यह मामला सिर्फ 5 या 10 रुपये का नहीं है।
यह सवाल है—
👉 रेलवे यात्रियों की मजबूरी की कीमत कौन तय कर रहा है?
👉 IRCTC का रेट चार्ट क्या सिर्फ पोस्टर बनकर रह गया है?
👉 मैनेजरों के ‘मौखिक आदेश’ कानून से बड़े कैसे हो गए?
जब ट्रेन में बैठे यात्री को न सही दाम मिलता है,
न सही पानी,
और न ही बिल—
तो फिर रेलवे के ‘यात्री सुविधा’ के दावे किस डिब्बे में सफर कर रहे हैं?
Exposed by Ayush Singh
