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भीड़, पसीना और आंसू: जनरल डिब्बे की एक अधूरी कहानी

इंटरनल एग्जाम देने के बाद अचानक ही मन बना कि अब घर जाना है। पर लंबी दूरी के लिए ट्रेन का कंफर्म टिकट मिलना आसान कहां होता है। जल्दबाजी में भोपाल से गोरखपुर के लिए कुशीनगर एक्सप्रेस में टिकट बुक कर लिया, लेकिन किस्मत ने साथ नहीं दिया और टिकट कंफर्म नहीं हुआ। सोचा, कोई बात नहीं, बस से चला जाता हूं। Abhi बस ऐप से टिकट लिया और 22 सितंबर को आईएसबीटी बस स्टैंड पहुंच गया। लेकिन बोर्डिंग से पंद्रह मिनट पहले ही मैसेज आया – “बस आज कैंसिल है।” उस पल समझ ही नहीं आया कि आखिर यह सब क्यों हो रहा है।

अब घर तो जाना ही था। मन बनाया कि भोपाल से ऐशबाग (लखनऊ) जाने वाली एक ट्रेन है, वहां से आगे का सफर किसी तरह कर लूंगा। जल्दी-जल्दी स्टेशन पहुंचा, ट्रेन प्लेटफॉर्म पर खड़ी थी। टिकट लेने का समय नहीं था, तो सीधे एसी कोच में चढ़ गया। सोचा टीटी से बात कर लूंगा। लेकिन जब चेकिंग हुई तो हालात बिगड़ गए। टीटी ने डांट-फटकार लगाकर मेरा सामान समेत जनरल कोच की ओर भेज दिया।

मैंने इतनी लंबी दूरी का सफर कभी जनरल डिब्बे में नहीं किया था। और वो भी तब, जब साथ में कपड़ों और किताबों से भरी ट्रॉली थी। हालत यह थी कि खड़े होने तक की जगह नहीं थी। किसी तरह बाथरूम के गेट के पास खड़ा रहा। एसी कोच से जनरल डिब्बे में पहुंचते ही घुटन और बदहवासी छा गई। लगा जैसे अभी बेहोश हो जाऊंगा। आंखें भर आईं, आंसू गिरने ही वाले थे, पर खुद को रोके रखा। भोपाल से ऐशबाग तक का सफर कभी दरवाजे के पास खड़े होकर, तो कभी जमीन पर बैठकर बीता।

उस वक्त मन में यही ख्याल आता रहा कि यह दुर्भाग्य है या जिंदगी मुझे कुछ सिखाना चाह रही है। मां के मन में न जाने कितनी बेचैनियां होंगी । मां बार-बार सोच रही होंगी – “बेटा ठीक है न, कुछ खाया होगा या नहीं? इतने लंबे सफर में कैसे जाएगा अकेला?” शायद पापा भी चुपचाप परेशान होंगे, पर दिखाएंगे नहीं। उनकी चिंता मेरे दिल तक महसूस हो रही थी ।

ट्रेन में जैसे दो अलग दुनिया थीं। एक तरफ एसी कोच, जहां लोग आराम से सो रहे थे, मोबाइल चला रहे थे, खाना खा रहे थे। दूसरी तरफ जनरल डिब्बा, जहां लोग किसी तरह ठसकर खड़े थे। कोई अपने बच्चे को गोद में लिए था, कोई थकान से आंखें मूंदे बैठा था। पसीने की गंध, उमस और भीड़ के बीच हर कोई बस मंज़िल तक पहुंचने की कोशिश कर रहा था।
शायद किस्मत मुझे यही सिखाना चाह रही थी कि जीवन हमेशा आसान नहीं होता। आराम और कठिनाई के बीच बस एक दरवाजा है, और हम कभी भी उसके इस पार या उस पार हो सकते हैं। यह सफर भले ही कठिन रहा, लेकिन उसने मुझे दूसरों की मजबूरियों को महसूस करने और खुद को समझने का मौका दिया।


Story by Ayush Singh



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