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सिर्फ बेटियां नहीं मरतीं, मर जाता है समाज का ज़मीर भी : आयूष सिंह

शब्दों से नहीं, सन्नाटों से डर लगने लगा है अब

कभी-कभी हृदय स्तब्ध रह जाता है जब इस दानवरूपी समाज को देखता हूं । सांस चलती है, पर भीतर कुछ मर जाता है। जब इस समाज के चेहरे पर वहशीपन की परत चढ़ी दिखती है, तब मन भीतर तक कांप जाता है। और फिर मन में असंख्य सवाल उभरने लगते हैं जिनका जवाब किसी किताब, किसी न्यायालय या किसी धर्म में शायद नहीं मिलता।
क्या यह वही समाज है जिसने स्त्री को देवी का दर्जा दिया था? या वह सम्मान अब सिर्फ त्यौहारों, मूर्तियों और भाषणों तक सिमटकर रह गया है?
ऐसे ही तमाम सवाल सिर्फ इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि विश्व की सबसे बड़ी जनसंख्या वाली भारत देश में जिस देश की औरतों को देवी का दर्जा दिया जाता है उसी देश में हर रोज उनका शोषण होता है , वह शोषण इतना बलपूर्वक किया जाता है कि उनकी चीखे भी समाज के सामने नहीं आ पाती ।
समाचार पत्रों और टेलीविजन के माध्यम से ऐसी तमाम खबरें हमारे सामने आती तो है , लेकिन कुछ चीखों की कहानीया खबरों की होड़ में या तो पीछे रह जाती हैं या तो उन्हें सामने आने ही नहीं दिया जाता है।
यह बात कोई नई नहीं है। लेकिन जब खुद के आसपास ऐसा कुछ होता है, तो सन्नाटा और भारी हो जाता है। बीते एक महीने में ऐसी दो घटनाओं की गूंज जिनका गवाह अप्रत्यक्ष रूप से मैं खुद था ,मेरे कानों में अब भी बसी हुई है।
पहली कहानी जिसमें दानव रूपी पिता ने ही अपनी शादीशुदा बेटी की हत्या कर दी वहीं दूसरी जहां पति और ससुराल वालों ने मिलकर हत्या को अंजाम दिया और उसकी मौत किसी अखबार के कोने में भी जगह नहीं पा सकी। केस दर्ज भी नहीं हुआ। और वह युवती बस एक याद बनकर रह गई।

(मृतिका का फोटो )
ऐसे ही कई चीखे दर्द से कराहती हुई सदैव के लिए शांत हो जाती है और हम मूक दर्शक बन देखते रहते है ।
ये दो घटनाएं कोई आंकड़ा नहीं हैं। ये दो इंसानी जिंदगियां थीं। उनके पीछे मां थी, भाई था, एक बचपन था, सपने थे… और शायद कोई अधूरी कविता भी, जो कभी पूरी नहीं हो सकी।
पर सबसे खतरनाक बात तो यह है कि इन घटनाओं पर समाज चुप रहता है। हम चुप रहते हैं। जैसे यह सब अब आदत का हिस्सा बन चुका हो। जैसे यह ‘नॉर्मल’ हो गया हो। “लड़की थी, कुछ तो किया होगा…”
“घर का मामला था, क्यों बाहर लाएं…”
“मां-बाप ही तो थे, थोड़ा गुस्सा कर दिया होगा…”
ऐसे वाक्य, ऐसी सोच ही सबसे ज़हरीली हैं। और यही सोच हमें दानव बना रही है।
शायद अब समय आ गया है कि हम सिर्फ समाचार पढ़ने वाले न रहें, बल्कि सवाल पूछने वाले बनें।
हर बार जब कोई स्त्री मारी जाती है, तो उसके साथ एक समाज का हिस्सा भी मरता है। और अगर हम उस मौत पर भी खामोश हैं, तो हम भी उस जुर्म में बराबर के भागीदार हैं।



Story covered by Ayush Singh

आयुष , माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में बी.एससी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के छात्र हैं। लेकिन उन्हें सिर्फ एक छात्र समझना गलती होगी — उनके लिए पत्रकारिता महज एक डिग्री नहीं, बल्कि ज़मीन से जुड़ा एक जुनून है। दिल्ली की चुनावी गलियों से लेकर बिहार के भूले-बिसरे गांवों तक, आयुष ने उन आवाज़ों को सुना है जिन्हें अक्सर अनसुना कर दिया जाता है। वे असली मुद्दों को कहानियों में बदलकर सामने लाने का काम करते हैं।
आयुष के लिए पत्रकारिता कोई करियर नहीं, बल्कि एक मिशन है — सत्ता से सवाल पूछने का, सच को सामने लाने का और उन लोगों के लिए खड़े रहने का, जिनकी बात कभी नहीं सुनी जाती। फील्ड रिपोर्टिंग हो या कंटेंट राइटिंग, आयुष उस पत्रकारिता में यकीन रखते हैं जो झुकती नहीं, सवाल उठाती है।
वे तीखी वार्ता नाम से एक डिजिटल प्लेटफॉर्म भी चलाते हैं, जहां बिना लाग-लपेट के ज़मीनी सवाल पूछे जाते हैं। इसके अलावा, आयुष टाइम्स ऑफ इंडिया के साथ कंटेंट राइटर के रूप में इंटर्नशिप भी कर रहे हैं, जहां वे राष्ट्रीय स्तर पर अपनी लेखनी से अपनी पहचान बना रहे हैं। आयुष सुर्खियों के पीछे नहीं भागते, बल्कि खुद सुर्खियां बनाते  हैं।

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