जब तक न्याय मिलेगा, तब तक इंसाफ़ मरता रहेगा।यह पंक्ति किसी कविता की नहीं, भारत के आम नागरिक की रोज़ की हकीकत है। कानून की किताबों में चाहे जितनी भी बातें लिखी हों, अगर वह ज़मीनी हकीकत में लोगों तक समय पर नहीं पहुंचे, तो न्याय एक दिखावा बनकर रह जाता है। भारत में आज न्यायपालिका की यही हालत हो गई है थकी हुई, बोझिल और बदलाव की सख्त जरूरत में।
भारत की अदालतें: बोझ तले दबी हुई व्यवस्था
भारत में अदालतों में लंबित मामलों की संख्या दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। आंकड़ों के अनुसार:
- देश में 5 करोड़ से अधिक मामले अदालतों में लंबित हैं।
- कई केसों में फैसले आने में 10-20 साल तक लग जाते हैं।
- निचली अदालतों से लेकर उच्चतम न्यायालय तक, हर स्तर पर फैसलों में देरी एक आम बात बन चुकी है।
ऐसे में सवाल उठता है: क्या हमारी न्याय प्रणाली लोगों को न्याय दिला पा रही है या सिर्फ तारीख़ पर तारीख़ दे रही है?
न्यायिक व्यवस्था की प्रमुख समस्याएँ
1.जजों की भारी कमी
भारत में प्रति 10 लाख जनसंख्या पर केवल 21 जज हैं, जबकि अमेरिका और यूरोपीय देशों में यह आंकड़ा 100 से ऊपर है। जब जज ही नहीं होंगे, तो मुकदमे कौन सुनेगा?
2. तकनीक की धीमी रफ्तार
21वीं सदी में भी कई अदालतें फाइलों के ढेर में दबी हुई हैं। डिजिटल कोर्ट, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और ऑनलाइन फाइलिंग जैसी सुविधाएं अब भी पूरी तरह लागू नहीं हो पाई हैं। कोविड-19 के दौरान यह स्थिति और भी साफ़ नज़र आई।
3.सरकारी केसों का अंबार
सरकार खुद सबसे बड़ी मुकदमेबाज़ बन चुकी है। छोटे-छोटे मामलों को भी कोर्ट में घसीटने से अदालतों पर अतिरिक्त बोझ बढ़ता है। इससे आम नागरिकों के मामलों की सुनवाई और भी पीछे धकेल दी जाती है।
4.लंबी प्रक्रिया, महंगा इंसाफ़
न्याय पाना आम आदमी के लिए महंगा सौदा बन चुका है। वकीलों की फीस, अदालत की तारीख़ों का इंतज़ार, और मानसिक तनाव – ये सब मिलकर न्याय की राह को और कठिन बना देते हैं।
सुधार की आवश्यकता क्यों और कैसे?
1.समयबद्ध न्याय
न्याय की सबसे बड़ी विशेषता उसकी समयबद्धता है। यदि फैसला देर से आता है, तो वह अपने आप में अन्याय बन जाता है।
2.जनता का भरोसा
जब लोग देखते हैं कि अपराधी खुलेआम घूम रहे हैं और पीड़ित वर्षों तक न्याय के लिए भटक रहे हैं, तो वे न्याय प्रणाली पर भरोसा खोने लगते हैं।
3.लोकतंत्र की मजबूती
एक मजबूत न्यायपालिका ही लोकतंत्र की रीढ़ होती है। अगर न्यायपालिका निष्पक्ष, तेज और सुलभ नहीं होगी, तो लोकतंत्र सिर्फ नाम का रह जाएगा।
संभावित समाधान
1.न्यायधीशों की संख्या बढ़ाई जाए
तेज़ न्याय के लिए अधिक जजों की जरूरत है। साथ ही, जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया पारदर्शी और तेज़ होनी चाहिए।
2.ई-कोर्ट्स का विस्तार
डिजिटल फाइलिंग, वीडियो सुनवाई और ई-गवर्नेंस को ज़मीनी स्तर पर लागू किया जाए, जिससे प्रक्रिया तेज़ और पारदर्शी हो।
3.मामूली अपराधों के लिए वैकल्पिक प्रणाली
लोक अदालत, मध्यस्थता और ग्राम न्यायालयों को बढ़ावा दिया जाए ताकि छोटे-मोटे विवाद बड़े कोर्ट तक न जाएं।
4.सरकारी मुकदमों की संख्या घटाई जाए
सरकारों को पहले आपसी समाधान की कोशिश करनी चाहिए, कोर्ट को अंतिम विकल्प बनाना चाहिए।
5.. जवाबदेही तय हो
न्यायपालिका को “अदृश्य और सर्वशक्तिशाली” मानने की प्रवृत्ति खत्म होनी चाहिए। फैसलों में देरी या गुणवत्ता की कमी के लिए एक सिस्टम तैयार हो जो जजों की जवाबदेही तय करे।
इंसाफ़ चाहिए, तारीख़ नहीं
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में अगर लोगों को न्याय समय पर नहीं मिलेगा, तो वे कानून पर विश्वास खो बैठेंगे। न्याय प्रणाली को केवल सुधार की ज़रूरत नहीं है, बल्कि एक संपूर्ण रूपांतरण की आवश्यकता है।
सच्चा लोकतंत्र वही है जहाँ अमीर-गरीब, नेता-जनता, सभी के लिए कानून एक समान और न्याय सुलभ हो।
इसलिए वक्त आ गया है कि हम न्यायिक सुधारों को सिर्फ नारेबाज़ी न समझें, बल्कि इसे एक राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाएं।
Story covered by Albeena Kumari

